शनिवार, 12 दिसंबर 2009

ग़ज़ल

तुम न पत्थरों को हटाया करो ....

तुम रात को रंगीनियाँ अता करो और ख्वाबों को महकाया करो,
मेरी ज़िन्दगी की कड़ी धूप में किसी बदली की तरह छाया करो।

चाहे रूठे रहो या बातें न करो, फिर भी में सब सह जाऊंगा,
बस न सितम करो मेरे ख़त को तुम, न किसी गैर को पढाया करो

अपने हुस्न की बेहतरी का न अभिमान उसे रह पायेगा,
कभी चाँदनी में सरे-चाँद तुम ये नकाब अपना हटाया करो।

तुम चुप्पियाँ साध जाती हो, जब-जब कहता हूँ प्यार है,
इस इकरार को शब्दों का बयान दो, अपनी ख़ामोशी के माइन बताया करो।

मुझे आसरों की उमीद नही, फ़क़त साथ का एहसास दो,
मैं ठोकरों में जी जाऊंगा, तुम न पत्थरों को हटाया करो.

कॉपीराइट @दुर्गेश कुमार ''शाद''