जब पसीना गुलाब था ........
"अब इत्र भी मलो तो खुशबू नही आती,
"अब इत्र भी मलो तो खुशबू नही आती,
वो दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था।"
आज के परिवेश, विशेषतः साहित्यिक परिवेश में उक्त पंक्तियाँ कितनी सटीक बैठती हैं, जबकि आज की घोर व्यावसायिक मानसिकता ने साहित्यिक अवधारणा या साहित्यिक मूल्यों को हाशिये पर ला खड़ा किया है। वे दिन शायद हवा हो चुके हैं, जब किताबें या पत्रिकाएँ सामाजिक-मूल्यों की पौध तैयार करती थी। हममें अच्छी सोच एवम संस्कार के बीजों के संचार के लिए एक 'प्लेटफार्म' तैयार करती थी। वे किताबे, जो सर्वजन हिताय, सामाजिक-मूल्यों से सरोकार रखती थी और ऐसी उच्च मानसिक भूमि तैयार करती थी, जिस पर मानवता व मानवीय-संवेदनाओ की उर्वर फसल लहलहाती थी।
आज बाज़ार में उपलब्ध किताबों या पत्रिकाओं पर नज़र डालें, तो हम ऐसी किताबें ही पाते हैं, जिनके मुखप्रष्ठ पर अर्धनग्न बालाएँ अथवा सिनेमा, खेल या टेलीविज़न-जगत से ताल्लुक़ रखने वाली हस्तियाँ ही होती हैं। क्यों हमारी किताबों के मुख पृष्ट पर -स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, आचार्य रजनीश (ओशो), महात्मा गाँधी, मुंशी, प्रेमचंद शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, रविंद्रनाथ बंकिमचंद, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह भगवान महावीर, नानक देव, गौतम बुद्ध, मिर्ज़ा ग़ालिब सरीखी हजारों विभूतियो को स्थान नहीं मिलता? व्यक्तिव में इनकी चरण-धूलि के बराबर भी ना होने के बावजूद आज हम उन्हें ही देख-सुन-पढ़ रहे हैं!
प्रश्न बेहद संगीन है, क्योकि हमारी आने वाली पीढ़ी की मानसिकता इन्ही पर अवलम्बित होगी। क्या उपरोक्त हस्तियों के समाज के प्रति योगदान को विस्मृत किया जा सकता है? नही। ये वही व्यक्ति हैं, जिन पर देश को सच्चा नाज़ है, जिनकी बदौलत हम विश्व का (अध्यात्मिक) गुरु होने का दंभ भरते रहते हैं। निःसंदेह, हमारी संस्कृति औरों से बेहतर और उच्च हैं, हमारे यहाँ आज भी मानवीय संवेदनाओं का महत्व है, मगर ऐसे परिवेश में हमें भी यंत्रवत होने में देर नहीं लगेगी।
आज की नौजवान पीढ़ी यही जानने और सोचने में लगी रहती है की अमिताभ बच्चन के ऑपरेशन का क्या हो रहा है? वे कौन से ब्रांड की घडी पहनते हैं? करीना कौन सा परफ्यूम लगाती है? जॉन को कौन सी बाइक पसंद है? आमिर खान या शाहरुख़ खान का हेयर ड्रेसर कौन है? तेंदुलकर को कौन सा पेय पदार्थ पसंद है या सानिया का ड्रेस कोड क्या है इत्यादि। वे क्यों नहीं जानना चाहते की नरेन्द्र को 'स्वामी विवेकानंद' या सिद्धार्थ क्यों 'गौतम बुद्ध' कहलाये? सुकरात को क्यों ज़हर दे दिया गया? महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा के क्या प्रयोग किये? सवाल ये है कि कौन से प्रश्न हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों से सरोकार रखते हैं? किन प्रश्नों का सामाजिक व नैतिक महत्व है? निःसंदेह उत्तरलिखित प्रश्नों का ही महत्व अधिक एवं सार्थक है।
और ऐसा भी नहीं है कि अमिताभ, तेंदुलकर, आमिर या सानिया का कोई सामाजिक महत्त्व नहीं है। मगर आदर्श रुप में इन सबका महत्त्व एवम दायरा अत्यंत सीमित है। उपरोक्त हस्तियाँ किसी क्षेत्र-विशेष की हैं, जिनका सामाजिक-हित में प्रभाव नगण्य है (हाँ दुष्प्रभाव ज़रूर हो सकता है!). अब सवाल यह है कि यह परिवर्तन आया कैसे ? स्वाभाविक रूप से हर परिवर्तन एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। ये समय की क्रमिकता के हिसाब से आये हैं। निम्न कारणों पर मंथन करें -
१. विशुद्ध व्यावसायिक सोच:- लेखक या संपादक की किताबें, समाज पर क्या प्रभाव डालेंगी के बजाय, वह कितना पैसा कमाकर देगी वाली मानसिकता।
२. मीडिया की भूमिका:- इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया द्वारा केवल फ़िल्मी, खेल या टेलीविज़न जगत की हस्तियों को ही 'हाईलाइट' करना।
३. पश्चिम के भोगवादी हमले:- भौतिक अथवा एन्द्रिय-सुख को तरजीह देना।
४. माता-पिता-गुरु की भूमिका:- इनकी भूमिका तब नकारात्मक ही कहलायेगी, जब वे बच्चों को बचपन से ही अच्छे साहित्य की ओर उन्मुख न कर सकें एवम उन्हें उपयुक्त वातावरण ना मुहैया करवा सकें।
५. उत्तरदायी लेखकों का पलायन:- आजीविका के लिए, ऐसे लेखको का व्यावसायिक होना, जो समाज को बहुत कुछ सार्थक दे सकते हैं।
६. सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग ना मिलना।
७. लोगो के लिए प्रेरक साहित्यिक वातावरण ना तैयार कर पाना।
उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर हम सभी के पास है। एक दुकान पर ज़हर भी मिलता है और दवाई भी। फैसला हमारा अपना है। चुनना हमें ही है कि हम स्वयं एवं अपने राष्ट्र का निर्माण कैसे करना चाहते हैं। फिर भी आज साहित्य को एक सामूहिक प्रयास एवं इसके पुनरुत्थान की प्रतिबद्धिता की दरकार है।
दुर्गेश कुमार ''शाद''
आज बाज़ार में उपलब्ध किताबों या पत्रिकाओं पर नज़र डालें, तो हम ऐसी किताबें ही पाते हैं, जिनके मुखप्रष्ठ पर अर्धनग्न बालाएँ अथवा सिनेमा, खेल या टेलीविज़न-जगत से ताल्लुक़ रखने वाली हस्तियाँ ही होती हैं। क्यों हमारी किताबों के मुख पृष्ट पर -स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, आचार्य रजनीश (ओशो), महात्मा गाँधी, मुंशी, प्रेमचंद शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, रविंद्रनाथ बंकिमचंद, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह भगवान महावीर, नानक देव, गौतम बुद्ध, मिर्ज़ा ग़ालिब सरीखी हजारों विभूतियो को स्थान नहीं मिलता? व्यक्तिव में इनकी चरण-धूलि के बराबर भी ना होने के बावजूद आज हम उन्हें ही देख-सुन-पढ़ रहे हैं!
प्रश्न बेहद संगीन है, क्योकि हमारी आने वाली पीढ़ी की मानसिकता इन्ही पर अवलम्बित होगी। क्या उपरोक्त हस्तियों के समाज के प्रति योगदान को विस्मृत किया जा सकता है? नही। ये वही व्यक्ति हैं, जिन पर देश को सच्चा नाज़ है, जिनकी बदौलत हम विश्व का (अध्यात्मिक) गुरु होने का दंभ भरते रहते हैं। निःसंदेह, हमारी संस्कृति औरों से बेहतर और उच्च हैं, हमारे यहाँ आज भी मानवीय संवेदनाओं का महत्व है, मगर ऐसे परिवेश में हमें भी यंत्रवत होने में देर नहीं लगेगी।
आज की नौजवान पीढ़ी यही जानने और सोचने में लगी रहती है की अमिताभ बच्चन के ऑपरेशन का क्या हो रहा है? वे कौन से ब्रांड की घडी पहनते हैं? करीना कौन सा परफ्यूम लगाती है? जॉन को कौन सी बाइक पसंद है? आमिर खान या शाहरुख़ खान का हेयर ड्रेसर कौन है? तेंदुलकर को कौन सा पेय पदार्थ पसंद है या सानिया का ड्रेस कोड क्या है इत्यादि। वे क्यों नहीं जानना चाहते की नरेन्द्र को 'स्वामी विवेकानंद' या सिद्धार्थ क्यों 'गौतम बुद्ध' कहलाये? सुकरात को क्यों ज़हर दे दिया गया? महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा के क्या प्रयोग किये? सवाल ये है कि कौन से प्रश्न हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों से सरोकार रखते हैं? किन प्रश्नों का सामाजिक व नैतिक महत्व है? निःसंदेह उत्तरलिखित प्रश्नों का ही महत्व अधिक एवं सार्थक है।
और ऐसा भी नहीं है कि अमिताभ, तेंदुलकर, आमिर या सानिया का कोई सामाजिक महत्त्व नहीं है। मगर आदर्श रुप में इन सबका महत्त्व एवम दायरा अत्यंत सीमित है। उपरोक्त हस्तियाँ किसी क्षेत्र-विशेष की हैं, जिनका सामाजिक-हित में प्रभाव नगण्य है (हाँ दुष्प्रभाव ज़रूर हो सकता है!). अब सवाल यह है कि यह परिवर्तन आया कैसे ? स्वाभाविक रूप से हर परिवर्तन एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। ये समय की क्रमिकता के हिसाब से आये हैं। निम्न कारणों पर मंथन करें -
१. विशुद्ध व्यावसायिक सोच:- लेखक या संपादक की किताबें, समाज पर क्या प्रभाव डालेंगी के बजाय, वह कितना पैसा कमाकर देगी वाली मानसिकता।
२. मीडिया की भूमिका:- इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया द्वारा केवल फ़िल्मी, खेल या टेलीविज़न जगत की हस्तियों को ही 'हाईलाइट' करना।
३. पश्चिम के भोगवादी हमले:- भौतिक अथवा एन्द्रिय-सुख को तरजीह देना।
४. माता-पिता-गुरु की भूमिका:- इनकी भूमिका तब नकारात्मक ही कहलायेगी, जब वे बच्चों को बचपन से ही अच्छे साहित्य की ओर उन्मुख न कर सकें एवम उन्हें उपयुक्त वातावरण ना मुहैया करवा सकें।
५. उत्तरदायी लेखकों का पलायन:- आजीविका के लिए, ऐसे लेखको का व्यावसायिक होना, जो समाज को बहुत कुछ सार्थक दे सकते हैं।
६. सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग ना मिलना।
७. लोगो के लिए प्रेरक साहित्यिक वातावरण ना तैयार कर पाना।
उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर हम सभी के पास है। एक दुकान पर ज़हर भी मिलता है और दवाई भी। फैसला हमारा अपना है। चुनना हमें ही है कि हम स्वयं एवं अपने राष्ट्र का निर्माण कैसे करना चाहते हैं। फिर भी आज साहित्य को एक सामूहिक प्रयास एवं इसके पुनरुत्थान की प्रतिबद्धिता की दरकार है।
दुर्गेश कुमार ''शाद''