Durgesh Sadh
बुधवार, 3 सितंबर 2014
कविता
देखो गर मिल सकें तो,
कुछ अल्फ़ाज़ मेरे,
वहीं-कहीं ज़मीं पर गिरे होंगे,
जो तुमने अपने कानों में नहीं पहने;
अब तो शायद वे धागों में भी ना पिरोये जा सकेंगे,
क्योंकि धागों में भी गाँठ पड़ गई होंगी।।।
कॉपीराइट @दुर्गेश कुमार
''शाद''
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