शनिवार, 8 नवंबर 2014

ग़ज़ल

 
इक आह चली, चलती ही रही,
जिस्म में रूह मचलती ही रही.
 
ख़ाक़ हो जायेंगे सारे पैक़र,
मौत ता-जिंदगी छलती ही रही.
 
हुआ ना रुख़ इस ओर फिर भी,
कमी इक उम्र खलती ही रही.
 
टूटने का इल्म तो था लहरों को मगर,
आग़ोशे-दरिया में पलती ही रही.
 
किसी के जाने से ज़िन्दगी नहीं रूकती,
जला जो परवाना, शमा जलती ही रही.
 
उनकी अक़ीदत तो दरिया से ''शाद'',
मौजें, जबीं साहिल पे मलती ही रही.
 
दुर्गेश कुमार "शाद"